Wednesday 28 October 2009

मेरा धर्म महान....तुम्हारा धर्म बकवास!!!

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हम लोग अक्सर देखते है कि पैगम्बरों और मसीहाओं द्वारा प्रचारित धर्मों में कितनी अधिक भिन्नता दिखाई पडती है !  कईं बार तो विस्मय होने लगता है कि जीवन-मृ्त्यु,लोक परलोक, समाज या सृ्ष्टि सम्बंधित उनकी विचारधाराओं में इतना अधिक मतभेद क्यूं हैं । जो अपने को ईश्वर का दूत कहते हैं ओर जिनकों इस बात का विश्वास है कि वो जो कुछ प्रचारित रहे हैं, वह प्रभु की प्रेरणा से हो रहा है---तो फिर उनमें विचारैक्य क्यूँ नहीं ? । एक ईश्वर का दूत ऎसी बातें कहकर दुनिया से विदा ले लेता है तो दूसरा दूत कुछ दूसरी ही बातों का प्रचार करके । सत्य अनेक नहीं हो सकते । वह तो सदैव एक ही रहेगा । विभिन्न रूपों में उसकी अनुभूति अवश्य होती है,ओर वह किसी न किसी रूप में हो ही रही है ।
तो हम देखते हैं कि न तो कोई वैज्ञानिक,न दार्शनिक ओर न ही कोई पैगम्बर,मसीहा इत्यादि ही जीवन के सत्य को उजागर कर पाता हैं ।  मेरी दृ्ष्टि में तो पैगम्बर,मसीहाओं नें तो भ्रमपूर्ण ज्ञान के प्रचार के साथ साथ ओर भी बहुत सारी गलतियाँ की हैं । सामाजिक अशान्ती को दूर करके मानवी समाज को सुखी एवं समृ्द्ध करने के लिए उन लोगों नें जिन उपदेशों का प्रचार किया,उनका क्या परिणाम निकला ?  अहिंसा का पालन करो,सत्य बोलो, सब पर दया करो---- इन उपदेशों नें सब धर्मों की भित्ति का काम किया है । मैं नहीं समझता कि दुनिया के किसी भी पैगम्बर नें  समाज को क्रूरता का पाठ पढाया होगा । एक इन्सान होकर दूसरे इन्सान से प्रेम करना,दूसरे के धर्म,परम्पराओं,धर्मग्रन्थों का सम्मान करना, दूसरे में कमियाँ ढूँढने की अपेक्षा अपनी कमियों को जानकर उन्हे दूर करने का प्रयास करना जैसी शिक्षाएँ प्राय: सब नें दी हैं । किन्तु कितने आश्चर्य की बात है कि उनके अनुयायियों की संख्या अत्यधिक होते हुए भी इस ग्रह का कोई भी भाग ऎसा नहीं है,जहाँ कि आज के समय में क्रूरता का नग्न प्रदर्शन न हो रहा हो ---जहाँ पीडितों का करूण क्रन्दन न सुनाई देता हो---जहाँ का वातावरण मिथ्या भाषण से कुत्सित न बनाया जाता हो ।

जीसस क्राईस्ट ने कहा था कि "धनी व्यक्ति के लिए स्वर्ग प्रवेश उतना ही असंभव है,जितना कि सूईं के छेद में से ऊँट का निकल जाना" लेकिन उनके कितने अनुयायियों नें इस उपदेश को कार्यरूप में परिणित किया । आज शायद दुनिया की आधी से अधिक सम्पति इन्ही के अनुयायियों के पास होगी । औरों की बात जाने दीजिए, स्वयं पोपों और विशपों नें धन इकट्ठा करने के जो उदाहरण दुनिया के सामने रखे हैं, वह क्रिश्चियन धर्म से अभिज्ञ किन्तु मानवी स्वभाव से अनभिज्ञ कोई व्यक्ति जान ले तो शायद उसकी आँखें हैरत से फट पडें । 

इन धर्म पंथों के अनुयायियों में न तो वैज्ञानिकों जैसी विश्लेषणात्मक मनोवृ्ति ही देखने को मिलती है ओर न ही स्पष्ट चिन्तन धारा । यहाँ सिर्फ विश्वास की प्रधानता हैं । लेकिन ये अगाध विश्वास, अजेय आस्था सिर्फ अपने पैगम्बर,मसीहों ओर उनके द्वारा विरचित धर्म ग्रन्थों पर ही है----न कि उनकी शिक्षाओं, उनके सिद्धान्तों पर ।
मुस्लिम धर्म के अनुयायी पैगम्बर मोहम्मद की बुद्धि पर कभी संशय नहीं कर सकते । यह विचार भी उनके लिए अपवित्र है कि पैगम्बर का मस्तिष्क भी गलतियाँ कर सकता था ओर उनके द्वारा प्रचारित उपदेशों का आधार भी गलत हो सकता है । ईसाई धर्म को मानने वाले कभी जीसस की शक्तियों पर अविश्वास नहीं कर सकते, उन्होने जो कुछ भी कहा उसे वे सत्य ही मानेंगें चाहे आप तर्क द्वारा जितना  भी समझाने का प्रयत्न कर लें । वे अपनी बुद्धि पर अविश्वास कर सकते हैं किन्तु अपने जीसस पर नहीं । उनकी नजर में जीसस ही सबसे महान हैं,अन्य कोई भी नहीं । इसी प्रकार दुनिया के अन्य धर्मावलम्बी भी अपने अपने भगवानों,महापुरूषों,पैगम्बरों,मसीहों पर अपरिमित आस्था रखते हैं । बौद्ध धर्म का अनुयायी गौतम बुद्ध के सामने किसी को कुछ नहीं समझता । सिक्ख गुरू नानक देव या गुरू गोबिन्द सिँह जी को जितना महान समझते हैं,यह किसी नानकपंथी या निहंग सिक्ख से मिलने पर अच्छी तरह मालूम हो सकता है । कहने का तात्पर्य ये है कि चाहे किसी भी धर्म के अनुयायी हों उनकी स्वधर्म के प्रति तार्किकता समाप्त हो जाती है, वहाँ सिर्फ अजेय आस्था और विश्वास ही काम करता है । लेकिन ये विश्वास की प्रधानता भी उन लोगों के लिए ही है जो कि किसी न किसी रूप में स्वधर्म का पालन कर रहे हैं, उनके लिए नहीं जो कि धार्मिकता एवं सर्वज्ञाता होने का ढोंग करते हुए, धर्म की आड लेकर किन्ही मूर्खतापूर्ण स्वार्थ सिद्धि के प्रयासों में लगे हुए हैं ।

आज के युग में धर्म तभी सार्थक माना जा सकता है जब कि वह सांसारिक जीवन में हमारा मार्ग प्रशस्त करे । केवल मरने के बाद जन्नत का सुख मिलने मात्र की आशा से उसे कोई नहीं पूछने वाला । देखा जाए तो जीवन पर प्रभाव उसी वस्तु का हो सकता है जो पूरे जीवन का अंग हो,जो जीवन की प्रत्येक क्रिया को प्रभावित करे....न कि उस वस्तु का जो कि स्थान और समय विशेष के लिए अपनी सुविधा अनुसार धारण कर ली जाए । इसके अतिरिक्त जीवन का अंग भी वह तभी बन सकती है जब वह वास्तविकता की,वर्तमान परिस्थितियों की अपेक्षा रखे । ऎसा सिर्फ तभी संभव हो सकता है जब कि उसका संबंध वर्तमान जीवन अनुभवों से हो ।

धर्म का आधार कुछ ओर नहीं, मनुष्य जीवन का अनुभव ही है, न कि किसी महापुरूष/संत की परोक्ष वाणी या किसी पीर पैगम्बर के मन की गढी हुई कल्पनाएँ,उनकी आज्ञाएँ । धर्म कुछ ओर नहीं बल्कि विशुद्ध मनोविज्ञान का विषय है,जिसके लिए किसी अन्य बाह्यतत्व से किसी मार्गदर्शन की अपेक्षा रखना ही व्यर्थ है । इसमें अगर आपका कोई मार्गदर्शक हो सकता है, तो, वो है----- सिर्फ आपका अन्तर्मन ।

Saturday 17 October 2009

आप सबको दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाऎँ!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

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शुभम् करोति कल्याणं, आरोग्यम धन संपदा|
शत्रु बुद्धि विनाशाय, दीप ज्योति नमोस्तुते ||

Tuesday 6 October 2009

मानवजाति के इतिहास को धर्म का रूप क्यों????

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यहीं ब्लागजगत में ही हमें कुछ दिन पहले किसी ब्लाग पर ये पढने को मिला कि सनातन धर्म में जो राजा मनु थे,वे ही वास्तव में हजरत नूह थे। नूह जिन्हे कि यहूदी, ईसाई और इस्लामिक धर्म में पैगंबर कहा गया हैं। कहते हैं कि कईं विद्वानों नें इस विषय पर कुछ शोध भी किए हैं।
सृ्ष्टि में जल प्रलय की ऐतिहासिक घटना तो संसार की समस्त सभ्‍यताओं में पाई जाती है। भाषा के बदलावों और लम्बे कालखंड के चलते भी आज तक इस घटना में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ है। सनातन धर्म में राजा मनु की यही कथा यहूदी, ईसाई और इस्लाम धर्म में "हजरत नूह की नौका" नाम से वर्णित की जाती है।
जावा, मलेशिया,इंडोनेशिया, श्रीलंका आदि विभिन्न देशों के लोगों ने अपनी लोक परम्पराओं में गीतों के माध्यम से इस घटना को आज भी जीवंत बनाए रखा है। इसी तरह धर्मग्रंथों से अलग हटकर भी इस घटना की जानकारी हमें विश्व के सभी देशों की लोक परम्पराओं के माध्यम से जानने को मिल जाती है।

हजरत नूह की नौका :- उस समय नूह की आयु कोई छह सौ वर्ष थी जब यहोवा (ईश्वर) ने उनसे कहा कि तू एक-जोड़ी सभी तरह के प्राणी समेत अपने सारे घराने को लेकर एक नौका पर सवार हो जा, क्योंकि मैं पृथ्वी पर जल प्रलय लाने वाला हूँ। उसके सात दिन उपरान्त ही प्रलय का जल पृथ्वी को अपने ग्रास में लेने लगा। धीरे-धीरे सम्पूर्ण पृथ्वी जलमग्न होने लगी। यहाँ तक कि इस पृ्थ्वी पर जितने भी बड़े-बड़े पर्वत थे, सब डूब गए। धीरे-धीरे उस नौका से बाहर का समस्त संसार उस जल प्रलय में विलीन हो चुका था। केवल हजरत नूह और जितने लोग उनके साथ नौका में सवार थे, सिर्फ वे ही बच पाए। जल ने सम्पूर्ण पृथ्वी को एक सौ पचास दिन तक डुबोए रखा। फिर जब धीरे-धीरे जल उतरा तो पुन: पृ्थ्वी प्रकट हुई और नौका में बैठे जो लोग बच गए थे,उन्ही से फिर नई दुनिया आबाद होती चली गई।

राजा मनु की कथा :-द्रविड़ देश के राजर्षि सत्यव्रत के समक्ष भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप में प्रकट होकर कहा कि आज से सातवें दिन भूमि प्रलय के दौरान जल में डूब जाएगी। तब तक आप एक नौका का निर्माण कर लें। चारों वेद, समस्‍त प्राणियों के सूक्ष्‍म शरीर तथा समस्त प्रकार की वनस्पतियों के बीज लेकर सप्‍तर्षियों सहित आप उस नौका पर चढ़ जाना। प्रचंड वेग के कारण जब आपकी नाव डगमगाने लगेगी तो मैं मत्स्य रूप में उसे बचा लूंगा। तब प्रलय के अंत तक मैं तुम्‍हारी नाव की रक्षा करूंगा। भगवान के कथन अनुसार सातंवे दिन से पृ्थ्वी पर जल प्रलय होने लगी तब उस समय मत्स्य रूप धारी भगवान श्री विष्णु ने उस नौका को हिमालय की चोटी "नौकाबंध" से बाँध दिया। प्रलयकाल की समाप्‍ति पर भगवान श्री विष्णु नें वेदों का ज्ञान राजा सत्यव्रत को दिया। उस ज्ञान-विज्ञान से युक्‍त होकर ही वो वैवस्‍वत मनु कहलाए। उक्त नौका में जो प्राणी शेष बच गए थे उन्हीं के द्वारा संसार में पुन: जीवनचक्र का आरंभ हुआ।

विचारणीय है कि कितने लोग होंगे जो मनु और नूह को एक ही व्यक्ति मानते होंगे या धार्मिक कट्टरता के चलते नहीं भी मानते होंगे। फिर भी यहाँ इतना तो कह ही सकते हैं कि तौरात, इंजिल, बाइबिल और कुरआन से पूर्व ही मत्स्य पुराण लिखा गया था, जिसमें उक्त कथा का उल्लेख मिलता है। यहाँ यह सिद्ध करने का प्रयास नहीं किया जा रहा कि अन्य धर्म ग्रंथों में पुराण से ही ली गई कथा है, जिसे अपने अपने तरीके से गढ़ा गया। तथ्‍य यह है कि उक्त घटना का स्थान, समय और परम्परा के मान से भिन्न भिन्न प्रभाव पड़ा और लोगों ने अपने तरीके से अपने धर्मग्रन्थों में इसे स्थान दिया। देखा जाए तो यह मानव जाति का इतिहास है न कि किसी धर्म विशेष का। इतना जान लेने के पश्चात भी मैं ये नहीं समझ पा रहा हूँ कि फिर आखिर झगडा किस बात का है,जब कि एक हिन्दू का भी यही इतिहास है,मुस्लिम का भी,यहूदी या फिर ईसाई का भी .........आखिर क्यों मानवजाति के इतिहास को धर्म का रूप दिया जा रहा है?

Sunday 6 September 2009

शायद अतृ्प्ति ही मनुष्य का प्रारब्ध है!!!

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विधाता ने जब इस सृ्ष्टि की रचना की तो एक अत्यंत सुन्दर देहधारी जीव का निर्माण किया और उसे नाम दिया मनुष्य। तब उससे बोले " जाओ भद्र्! ये पृ्थ्वी तुम्हारा क्रीडास्थल है,बुद्धि-ग्यान समर्थ दस इन्द्रियां तुम्हारे पास हैं;यथेष्ट सुखोपभोग करने के लिए जैसा उचित समझो इनका प्रयोग करना। किन्तु संसार में प्रवेश करने से पूर्व क्षीरसागर में स्नान करके अपने इस शरीर को शुद्ध कर लेना। वहाँ तुम्हें दो तरह से वस्त्र मिलेंगे। उनमें से जो तुम्हें अनुकूल लगें उन्हे धारण कर लेना। अभी तक तो तुम नग्न हो किन्तु संसार में नग्न प्रवेश करना निषिद है"
मनुष्य विधाता के आदेशानुसार क्षीरसागर में स्नान करके जब बाहर निकला तो वहाँ उसे दो प्रकार के वस्त्र रखे मिले,जिनमें एक पर लिखा था "सुख" और दूसरे पर "दुख"।
अब वो बेचारा तो चकरा गया कि किस वस्त्र को धारण करे। क्योंकि अभी तक तो वो इन दोनों के मूल्यों से अपरिचित था। एक बार तो उसके मन में आया कि दोनों को ही धारण कर लिया जाए--फिर सोचा कि ये तो विधाता के आदेश की उल्लंघना होगी। उन्होने कहा था कि दोनों में से एक वस्त्र धारण करना है।
बहुत देर तक सोचविचार करने के बाद सुख नाम के वस्त्र को उसने उठा लिया। उसे उठाते ही उसके नीचे बैठे हुए "कर्म" ने उसका हाथ पकड लिया। बोला" ठहरो मानव्! इस वस्त्र के ग्रहण करने पर आपको मुझे भी अपने साथ लेकर चलना होगा अन्यथा तुम इसे धारण नहीं कर सकते।"
इतना सुनते ही मनुष्य नें सोचा कि अभी तो खुद मुझे नहीं पता कि मैने कहाँ जाना है तो भला इसे मैं कहाँ अपने साथ उठाए फिरूंगा।  यह सोच कर उसने सुख नाम के वस्त्र को धारण करने का विचार ही मन से निकाल दिया और जैसे ही "दुख" नामक दूसरे वस्त्र को उठाकर पहनने लगा तो झट से उसके नीचे बैठा "अधर्म" बोल पडा " ठहरो मानव्! यदि तुम इस वस्त्र को धारण करना चाहते हो तो तुम्हें अन्त तक मुझे अपने साथ रखना होगा"
अब मनुष्य उसे भी जहाँ का तहाँ रखकर एक गहरी चिन्ता में डूब गया --कि किसे पहने और किसे छोडे।
बहुत सोच विचार करने के बाद उसने दोनो वस्त्रों को हटाकर, कर्म और अधर्म से पूछा "मैं नहीं जानता कि मुझे तुममे से किसे अपने साथ रखना चाहिए;क्यों कि मैं अभी तक तुम्हारे गुण दोषों से अपरिचित हूँ। क्या मुझे परीक्षण के लिए कुछ समय मिल सकता है।"
मनुष्य की प्रार्थना सुनकर दोनों नें ही उसे परीक्षण के लिए कुछ समय देना स्वीकार कर लिया।
उस दिन से मनुष्य नें परीक्षण का कार्य आरम्भ किया। कभी वो सुख नाम के वस्त्र को धारण कर संसार में प्रवेश करता है और सुखी नाम से संबोधित होता; तो कभी दुख नाम के वस्त्र को धारण कर अधर्म के साथ संसार में आकर  दुखी नाम से संबोधित होता; लेकिन आज तक वो ये निर्णय नहीं ले पाया--"कौन सा वस्त्र मेरे लिए हितकारी है" । सृ्ष्टि के आदिकाल से उसका यह परीक्षण चल रहा है । न तो वह सुख से तृ्प्त हो पाता है और न ही दुख से;शायद अतृ्प्ति ही उसका प्रारब्ध बन चुकी है।

Tuesday 18 August 2009

भिखारी कौन?

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वैशेषिक दर्शन के सूत्रधार ऋषि कणाद
जंगल में एक छोटी सी कुटिया बनाकर रहा करते थे। वह या तो कंद-मूल खाते या फिर अन्न के कण चुनकर लाते और उससे ही अपनी क्षुधा शांत करते। अन्नकणों से जीवन निर्वाह करने के कारण ही उनका नाम कणाद पडा। एक बार की बात है कि किसी ने उस देश के राजा से कह दिया कि, "आपके राज्य में ऐसा भी एक भिखारी है जो खेतों से अन्न बीनकर अपनी उदरपूर्ति करता है।" यह सुनकर राजा चौंका। राजा ने तत्काल मंत्री को आदेश दिया कि तुम भोजन लेकर जाओ और भरपेट खिलाकर उस भिखारी को तृप्त करो।
राजा
ज्ञा पाकर मंत्री ऋषि कणाद के पास पहुंचा। उसने कणाद से भोजन करने का आग्रह किया, परन्तु श्रृषि ने भोजन करने से इन्कार कर दिया। जब राजा को पता चला तो वह दुविधा में पड़ गया कि आखिर यह कैसा भिखारी है, जो अत्यंत आग्रह करने पर भी कुछ स्वीकार नहीं करता। रानी के कानों में भी यह बात पहुंची। किसी ने उन्हें बताया कि कणाद अलौकिक प्रभाव के सिद्ध पुरुष हैं और सोना बनाने की कला भी जानते हैं।

स्वर्ण सिद्धि के प्रसंग ने राजा को भी व्याकुल बना दिया। अगले दिन वह उनके पास पहुंचा ओर कणाद को प्रणाम कर  कहने लगा, "ऋषिवर! मैंने मंत्री को आपकी सेवा में भेजा था। आपने भोजन अस्वीकार क्यों कर दिया? कितना अच्छा होता, यदि आप अपने इस दास पर अनुग्रह करते।" ऋषि कणाद मुस्कराते हुए खड़े खडे उसकी बात सुनते रहे। कुछ क्षणों बाद राजा ने पुन: कहा, "ऋषिवर! मैंने सुना है आपके पास स्वर्ण विद्या है। कितना अच्छा हो उसे प्रदान कर आप मुझे अनुग्रहीत करें। स्वर्ण की तो राजपाट के संचालन के लिए आवश्यकता होती है। साधु-सन्यासियों का उससे क्या प्रयोजन।"

इस पर ऋषि कणाद बोले, "राजन! बताओ हम दोनों में भिखारी कौन है? भीख मांगने मैं आपके पास गया था या आप भीख मांगने मेरे पास आए हैं।"

राजा यह सुनकर मौन हो गया। ऋषि कणाद ने फिर कहा, "जिसके पास किसी चीज का अभाव होता है वह भिखारी नहीं होता। भिखारी वह होता है जो सब कुछ होने के पश्चात भी असंतुष्ट रहता है। इसलिए संतोष धारण करो। धन से आज तक किसी की तृप्ति हुई है भला।" 

Friday 7 August 2009

श्रद्धा और विश्वास

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एक बार की बात है जब स्वामी विवेकानंद विदेश यात्रा पर गए हुए थे। भ्रमण के दौरान उनकी मुलाकात एक संत से हुई जो अपने इलाके में बहुत अधिक प्रसिद्ध थे। उन संत का एक बहुत बड़ा आश्रम भी था। उस आश्रम में उनके साथ बहुत से शिष्य भी रहा करते थे और संत के कमरे के बाहर उनकी एक् बडी सी आदमकद तस्वीर लगी हुई थी। अब उन संत के साथ बैठे बैठे विवेकानंद जी की विभिन्न मुद्दों पर चर्चा होने लगी। बातचीत के दौरान विदेशी संत कहने लगे, " स्वामी जी, मैं हैरान हूँ कि आपके देश में कितना आडंबर भरा पडा है। कैसे लोग हैं जो कि एक पत्थर की मूर्ति की पूजा करते हैं। जब भगवान कण-कण में हैं तो फिर पत्थर की मूर्ति की पूजा क्यों? इसे ढकोसला ओर अन्धविश्वास ही तो कहा जाएगा।"

स्वामी विवेकानंद कुछ देर तक तो कुछ सोचते रहे। उनके अगल-बगल बैठे संत के शिष्य उन दोनों की बातें बहुत ध्यानपूर्वक सुन रहे थे ओर साथ ही साथ मन ही मन प्रसन्न भी हो रहे थे कि हमारे सन्त नें एक हिन्दोस्तानी बाबा की बोलती बन्द कर दी। अचानक स्वामी जी उठे ओर उनके एक शिष्य से कहने लगे, "आप लोगों नें ये क्या तमाशा बना रखा है। आपके गुरु आपके सामने बैठे हैं फिर भी उनकी तस्वीर यहां रखी हुई है। इसे फेंको यहां से।" और जैसे ही स्वामी जी ने तस्वीर फेंकने के लिए उस पर हाथ लगाया, उनके बगल में खड़ा एक शिष्य उनका हाथ पकड़कर बोला, "शर्म आनी चाहिए आपको! आपने हमारे गुरु का अपमान किया है। क्या आपके देश में संतों का इसी तरह से अपमान किया जाता है?"

विवेकानंद जी मुस्करा कर बोले, "नहीं भाई, हमारे देश में तो संतों की उपासना की जाती है। उनके चरण रज को लोग अमृत समझकर पीते हैं। मैं तो बस आपके गुरु के प्रश्न का उत्तर दे रहा था।"
फिर वह संत से सम्बोधित हुए " देख लिया आपने, आपके शिष्य आपकी तस्वीर का अनादर होते देखना नहीं चाहते क्योंकि आपकी तस्वीर में इन लोगों की श्रद्धा है जबकि सच यह है कि यह तस्वीर आपकी प्रतिकृति मात्र है। लेकिन इसमें आप दिखाई पड़ते हैं। उसी तरह भगवान कण-कण में विराजमान हैं लेकिन जो लोग मूर्ति पूजा करते हैं, उन्हें भगवान उसी में दिखाई पड़ते हैं।

यह श्रद्धा और विश्वास है कि हमारे यहां के लोग भगवान को कहीं भी खोज लेते हैं पत्थर की मूर्ति में और पीपल के पेड़ में भी।

Wednesday 15 July 2009

क्या हम सचमुच मनुष्य हैं ?

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बहुत प्राचीन समय की बात है। अरब देश की एक मल्लिका थी जिसने मरते समय एक इच्छा प्रकट की कि मेरी मौत के बाद मेरी कब्र के पत्थर पर यह लिखवा दिया जाए कि -----" इस कब्र मे अपार धनराशि गढी हुई है, जो भी व्यक्ति अत्यंत निर्धन, दीन-दरिद्र और अशक्त हो, वह इसे खोद कर प्राप्त कर सकता है। "
मल्लिका के मरने के बाद उसकी कब्र पर वैसा ही खुदवा दिया गया,जैसी कि उसकी इच्छा थी। कब्र बनाये जाने के बाद से हजारों दरिद्र और भिखमंगे उधर से गुजरे होंगे, लेकिन उनमे से शायद कोई भी इतना दरिद्र नही था कि धन के लिए किसी मरे हुए व्यक्ति की कब्र खोदेने जैसा घृ्णित कर्म करता। आखिरकार वक्त बीतने के साथ ही वह इन्सान भी आ पहुँचा, जो उस कब्र को खोदे बिना नही रह सका। अचरज की बात तो यह थी कि कब्र खोदने वाला यह व्यक्ति स्वयं एक सम्राट था जिसने कि हमला करके कब्र वाले इस देश को जीत लिया था।  अपनी जीत के साथ ही उसने बिना समय गँवाए उस कब्र की खुदाई का काम आरम्भ कर दिया, लेकिन कब्र की गहराई मे उसे अपार धनराशि की बजाय एक पत्थर मिला, जिस पर लिखा हुआ था-ऐ कब्र खोदने वाले इन्सान, तू अपने आप से सवाल कर-" क्या तू सचमुच मनुष्य कहलाने के लायक है ? " निराश व अपमानित वह सम्राट, जब कब्र से वापस लौट रहा था तो लोगो ने कब्र के पास ही रहने वाले एक बुढे भिखारी को जोर से हंसते देखा। वह कह रहा था-" मैं सालो से इंतजार कर रहा था, अंततः आज धरती के सबसे अधिक निर्धन, दरिद्र एवम् अशक्त व्यक्ति का दर्शन हो ही गया ! "
सचमुच  जिस ह्रदय मे संवेदना नही है, वही सबसे बडा दरिद्र, दीन और अशक्त है। जो संवेदना के अतिरिक्त किसी और संपत्ति  के फेर मे पडा रहता है, एक दिन उसकी सम्पदा ही उससे पूँछती है-बता! क्या तू मनुष्य है ?
आईये आज एक बार हम भी जरा अपने आप से पूछ कर देखें-----"क्या हम सचमुच मनुष्य है" ?

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